बरसों के हिसाब ओ ख़याल छूट गए...तेरी सोहबत में साकी...
तूने हिजाब का ख़याल न रक्खा...मैंने शराब का हिसाब न रक्खा...
हम पीते हैं के..झेल सकें ज़िन्दगी के सवालों को..
अहसान तेरा ... तूने कोई सवाल न रक्खा...
थक गए हयात में...खाबों के जुगनू पकड़ के अब...
जो रहा वो रहा ...किसी उडनेवाले का 'मलाल' न रक्खा..
'नशे' की नींद में भी...आँखों में चुभता था हरदम ...
वापस कर दिए सब ...'होशवालों' का कोई ख्वाब न रक्खा..
वो हम नहीं कमदिल...जो कम-कम,बचा-बचा के पीते हैं...
पी चुके अपने हिस्से की...एक क़तरा भी 'ज़नाब' न रक्खा...
बिना पिए भी...नशा 'खुद्दारी'का तारी रहता है 'संतोष'.....
दोस्त हैं तो गुलाम...वरना किसी 'रुतबे' का 'रुवाब'न रक्खा..

AMAZING!
ReplyDeleteShukriya!
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