इबादत करता हूँ ,मंदिर मस्जिद नहीं जाता...
दोस्ती में हाथ ,पहले बढ़ाने से गिर नहीं जाता...
हर आम ओ ख़ास शहर में, चाहनेवाला है उसका ...
सिर्फ इसलिए...कोई शख्स... मुझे नहीं भाता...!
मुहब्बत करता हूँ, मगर 'क़ुबूल' नहीं पाता...
झुकने से तेरे आगे ,मेरा गुरूर नहीं जाता...
अच्छा लगे तुमको.... मुरीद हो जाओ मेरे...
सिर्फ इसलिए...कहूँ 'नज़्म'... मुझे नहीं आता...!
शिकायत करता हूँ,जवाब ऐ तहरीर नहीं पाता...
कहने से किसी को 'ज़नाब' मेरा ज़मीर नहीं जाता...
मैं अदना 'कारिन्दा'ओर वो बड़े 'साहिबान' लगें...
सिर्फ इसलिए...कोई 'हुक्म'... मुझे नहीं भाता...!
अदावत करता हूँ,हुनर ऐ 'क़त्ताल' नहीं आता ..
जंग में प्यादे से खाऊं मात ....मलाल नहीं आता
डसा है जिसने ....वो कभी आस्तीन में पला था...
सिर्फ इसलिए....'बख्श दूं'...ख़याल नहीं आता...!
बग़ावत करता हूँ, मुकाबिल तलवार नहीं लाता...
दब जाऊं बुजुर्गों से, ..मेरा ज़लाल नहीं जाता...
जो बचाई खुद्दारी तो...गँवा सकता हूँ सबकुछ...
सिर्फ इसलिए..डर जाऊं ... 'मेरे यार'...नहीं आता...!
क़त्ताल=जो असहमत लोगों को मारने के लिए तैयार हो
क़ुबूल =इकरार
कारिन्दा=स्टाफ,मुंशी
मलाल =अफ़सोस

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