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Tuesday, 24 April 2012


दरख़्त .....



तुम्हारे इंतज़ार में अब तक खड़ा हूँ....
सूखे दरख़्त सा...
काम आता हूँ...
घर का चूल्हा जलाने के ....
घोंसला थामे हूँ....
कुछ पंछियों का...
लौटते सूरज  से ...
बर पूछता हूँ...
सूख जाता हूँ...
कुछ और...
फिर...
कटुता से मुस्कुराता हूँ...
चाँद की ...
तारों संग...
आवारगी देख कर...
कोई रोज सवेरे सींचता भी है...
मेरे पैरों को...
पता नहीं...
पीपल समझ कर...
या...
उम्मीद में है...
की...
कोंपलें फिर फूटेंगी....