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Tuesday, 24 April 2012


दरख़्त .....



तुम्हारे इंतज़ार में अब तक खड़ा हूँ....
सूखे दरख़्त सा...
काम आता हूँ...
घर का चूल्हा जलाने के ....
घोंसला थामे हूँ....
कुछ पंछियों का...
लौटते सूरज  से ...
बर पूछता हूँ...
सूख जाता हूँ...
कुछ और...
फिर...
कटुता से मुस्कुराता हूँ...
चाँद की ...
तारों संग...
आवारगी देख कर...
कोई रोज सवेरे सींचता भी है...
मेरे पैरों को...
पता नहीं...
पीपल समझ कर...
या...
उम्मीद में है...
की...
कोंपलें फिर फूटेंगी....

Monday, 19 September 2011

दिल से...

रास्ते ...ठिकाने...निगाहें...बदलने से नहीं...भूल पाओगे...
दिल वही है...निगाहों को... रास्ता बता ही देगा..ठिकाने का...
रहमदिली...कमदिली...बुजदिली...चूकता दिल ही है...
हर  खंज़र पे होता है ..खुदा निशां .. निशाने का...
मौका...माहौल...मुनासिब...उम्र...उम्मीद...उफ्फ़!
सब दिल देने से...रास्ता है...खुद को बचाने का...
नज़र-अंदाजी...तुर्श-जबानी...गर्म-मिजाजी...सब दिखावा है ...
मोहब्बत छिपाने का...माशूक को... अंदाज़  दिखाने का...
आंसू...आशाएं...अरमान...निकलने नहीं देता दिल से...
किसी से  किया है...वादा मैंने...खुद  से 'निभाने' का...

Friday, 16 September 2011

'मलाल' न रक्खा....



बरसों के  हिसाब ओ ख़याल छूट गए...तेरी सोहबत में साकी...
तूने हिजाब का ख़याल न रक्खा...मैंने शराब का हिसाब न रक्खा...
हम पीते हैं के..झेल सकें ज़िन्दगी के सवालों को..
अहसान तेरा ... तूने कोई सवाल न रक्खा...
थक गए हयात में...खाबों के जुगनू पकड़ के अब...
जो रहा वो रहा ...किसी उडनेवाले का 'मलाल' न रक्खा..
'नशे' की नींद में भी...आँखों में चुभता था हरदम ...
वापस कर दिए सब ...'होशवालों' का कोई ख्वाब न रक्खा.. 
वो हम नहीं  कमदिल...जो कम-कम,बचा-बचा के पीते हैं...
पी चुके अपने हिस्से की...एक क़तरा भी 'ज़नाब' न रक्खा...
बिना पिए भी...नशा 'खुद्दारी'का तारी  रहता है 'संतोष'.....
दोस्त हैं तो गुलाम...वरना किसी 'रुतबे' का 'रुवाब'न रक्खा..

Thursday, 8 September 2011

सोच लेना पहले

सोच लेना पहले....
हर फैसले के.....
मंजिल नहीं होती...
आखिर में हर रास्ते के..
मगर...कई बार ...
रास्ते ,मंजिलों के लिए नहीं
सिर्फ साथ के लिए चुने जाते हैं...!
सोच लेना पहले....
हर सपने के....
आसां नहीं  होता.. सपनों को...
याद रख पाना ..नींद खुलने पर 
मगर..कई बार..
सपने पूरे  करने के लिए नहीं....
सिर्फ खुश रहने के लए देखे जाते हैं...!
सोच लेना पहले 
घर  बनाने के.....
बहोत  मुश्किल होता है...
मकान को घर.....बनाये रखना...
और  ...कई बार...
खुद 'टूट' के भी घर बचाना होता है...
नहीं तो....बच्चे 'भींग' जाते हैं......!


Saturday, 3 September 2011

एक ख्वाब में जी रहा है ....!



बस गया है 'कुछ' आँखों में

'वो' पलकों को सी रहा है ....

एक ख्वाब में जी रहा है ....!

'प्रिये' जो भी कहो ला दूंगा...

ज्यों पानी..रूपया उसी तरा है...

एक ख्वाब में जी रहा है ....!

घिरा जोमुश्किलों में..दादा कहेंगे...

रो मत ..भाई नहीं मरा है..

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

बिटिया हुयी बड़ी अब...

'वो' अब भी उसी तरा है..

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

'नहीं पीता' के माँ कहेगी...

'बेटा'फिर से 'पी' रहा है...

एक ख्वाब में जी रहा है ...!

संसद में बैठा 'अन्ना'..

'उसका'चेहरा खुशी भरा है....

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

'जोड़ा' कुछ भी नहीं तो क्या..

'वो' सबकी ख़ुशी रहा है...

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

रिश्वत पे बिगड़ा नेता...

'बे'.. ईमान नहीं मरा है...

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

और

कह के 'किरण' की तरा सच एक दिन

वो भी कहेगा ...हाँ जी कहा है...

एक ख्वाब में जी रहा है... !

Friday, 2 September 2011

घबराता है.

आँखों को हर पल उसी दिलरूबा की तलाश
दिल है के हर सूरत ऐ नाज़ से घबराता है
वो 'छन्न' से हुयी थी सपने  टूटने की आवाज़ ...
के दिल आज तलक हर साज से घबराता है..
सुने हैं इतने किस्से ....रांझों और मजनुओं के..
अंजाम खुद अपने ही...आगाज़ से घबराता है..
छीन लाएगा अपने बच्चों का निवाला...
ये वो परिंदा नहीं जो बाज से घबराता है ...
ढूंढते है पनाह लोग...ख्वाबों की उड़ान में...
संतोष ...खुद अपनी परवाज़ से घबराता है..
                         'और '
चूका देता..झूठा टैक्स भी 'अरविन्द' 
मगर असल  से नहीं ब्याज से घबराता है. 

Thursday, 1 September 2011

नहीं आता ..


इबादत करता हूँ ,मंदिर मस्जिद नहीं जाता...
दोस्ती में हाथ ,पहले बढ़ाने से गिर नहीं जाता...
हर आम ओ ख़ास शहर में, चाहनेवाला है उसका ...
सिर्फ इसलिए...कोई शख्स... मुझे नहीं भाता...!
मुहब्बत करता हूँ, मगर 'क़ुबूल' नहीं पाता...
झुकने से तेरे आगे ,मेरा गुरूर नहीं जाता...
अच्छा लगे तुमको.... मुरीद हो जाओ मेरे...
सिर्फ इसलिए...कहूँ 'नज़्म'... मुझे नहीं आता...!
शिकायत करता हूँ,जवाब ऐ तहरीर नहीं पाता...
कहने से किसी को 'ज़नाब' मेरा ज़मीर नहीं जाता...
मैं अदना 'कारिन्दा'ओर वो बड़े 'साहिबान' लगें...
सिर्फ इसलिए...कोई 'हुक्म'... मुझे नहीं भाता...!
अदावत करता हूँ,हुनर ऐ 'क़त्ताल' नहीं आता ..
जंग में प्यादे से खाऊं मात ....मलाल नहीं आता
डसा है जिसने ....वो कभी आस्तीन में पला था...
सिर्फ इसलिए....'बख्श दूं'...ख़याल नहीं आता...!
बग़ावत करता हूँ, मुकाबिल तलवार नहीं लाता...
दब जाऊं बुजुर्गों से, ..मेरा ज़लाल नहीं जाता...
जो बचाई खुद्दारी तो...गँवा सकता हूँ सबकुछ...
सिर्फ इसलिए..डर जाऊं ... 'मेरे यार'...नहीं आता...!

क़त्ताल=जो असहमत लोगों को मारने के लिए तैयार हो
क़ुबूल =इकरार
कारिन्दा=स्टाफ,मुंशी
मलाल =अफ़सोस