बचपन से नहीं जानता उसको..
पर बचपना जानता हूँ उसका...
मिली तब भी छोटी नहीं थी..
हाँ मासूमियत बच्चों जैसी ही थी ..
हर बात पे साबित करना चाहती थी..
के,अब बच्ची नहीं है वो..
पर कहाँ समझ पाती थी..
के,मैं उसकी बातें नहीं आवाज़ सुनता हूँ..
के,मैं ग्रुप फोटो में भी सिर्फ उसको ही देख पाता हूँ..
के, मैं अचानक चुप हो जाता हूँ,उसके दोस्तों के किस्से सुनके...
जब तक वो समझ पाई ...
मैं भी बच्चा बन गया था उसके साथ..
अपनी समझदारी के लबादे उतार ...
एक अलिखित समझौता हो गया..
जब वो बच्चों की तरह..
लडती,चीखती,भटकती,
मैं बड़ा बन जाता..मना लेता
जब मैं बहकता,मचलता,बहलाता..
वो बहोत बड़ी बन जाती..रोक लेती
ज़िन्दगी झरने सी लगती थी..
फिर एक दिन !
दोनों बड़े हो गए..
न उसने रोका...
और न मैं ही मना पाया..
बचपना भूल गए हम...!
ज़िन्दगी ठहर गयी समंदर की तरह
