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Wednesday, 31 August 2011

...समंदर


बचपन से नहीं जानता उसको..
पर बचपना जानता हूँ उसका...
मिली तब भी छोटी नहीं थी..
हाँ मासूमियत बच्चों जैसी ही थी ..
हर बात पे साबित करना चाहती थी..
के,अब बच्ची नहीं है वो..
पर कहाँ समझ पाती थी..
के,मैं उसकी बातें नहीं आवाज़ सुनता हूँ..
के,मैं ग्रुप फोटो में भी सिर्फ उसको ही देख पाता हूँ..
के, मैं अचानक चुप हो जाता हूँ,उसके दोस्तों  के  किस्से सुनके...
जब तक वो समझ पाई ...
मैं भी बच्चा बन गया था उसके साथ..
अपनी समझदारी के लबादे उतार ...
एक अलिखित समझौता हो गया..
जब वो बच्चों की तरह..
लडती,चीखती,भटकती,
मैं बड़ा बन जाता..मना लेता 
जब मैं बहकता,मचलता,बहलाता..
वो बहोत बड़ी बन जाती..रोक लेती 
ज़िन्दगी झरने सी लगती थी..
फिर एक दिन !
दोनों बड़े हो गए..
उसने रोका...
और मैं ही मना पाया..
बचपना भूल गए हम...!
ज़िन्दगी ठहर गयी समंदर की तरह 

Sunday, 21 August 2011

कृष्ण!!!

कृष्ण!!! एक कला है..!

एक मीरा से,  आत्मिक प्यार की........!

सोलह हज़ार रानियों से, व्यवहार  की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

सुदामा से, मित्र  के उद्धार की...!

जरासंध से, दुष्ट के संहार की...!

कृष्ण!!! एक कला है..!

द्रौपदी को, चीर के सहार की.....!

सखियन से ,वस्त्रों के खिलवाड़ की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

गोपियों पर रास के  फुहार की...!

पूतना पर बालक के प्रहार की...!

कृष्ण!!! एक कला है..!

मित्र मनसुखा से,मान और मनुहार  की..!

कालिया से,विषधर नाग के  नथार की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

दाऊ से अग्रज को, नमस्कार की..!

कंस से मामा के,स्वर्ग-सिधार की...!

कृष्ण!!! एक कला है..!

महाभारत में अर्जुन को ललकार की..!

मरना हो निश्चित तो,युद्ध से भगजान  की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

गोवर्धन से पर्वत को,कनिका पै धार की..!

माखन की चोरी  पे,मैया से गुहार की....!

कृष्ण!!! एक कला है..!

जननी देवकी से , विछोह संभार की..!

माता  यशोदा के,चरण पखार की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

बांसुरी की तान पे,सुध बिसरान की..!

पाञ्चजन्य के नाद पे,अस्त्र  उठान की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

राजनिती में ,उच्चतम विचार की..!

युद्ध के मैदान में,घातक दुष्प्रचार की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

जीवन में,मर के भी मार की..!

प्यार में,जीत कर भी हार की...!

            और 

कृष्ण करे सो होय...!

फिर  दोष काहे को  मोय......!