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Monday, 19 September 2011

दिल से...

रास्ते ...ठिकाने...निगाहें...बदलने से नहीं...भूल पाओगे...
दिल वही है...निगाहों को... रास्ता बता ही देगा..ठिकाने का...
रहमदिली...कमदिली...बुजदिली...चूकता दिल ही है...
हर  खंज़र पे होता है ..खुदा निशां .. निशाने का...
मौका...माहौल...मुनासिब...उम्र...उम्मीद...उफ्फ़!
सब दिल देने से...रास्ता है...खुद को बचाने का...
नज़र-अंदाजी...तुर्श-जबानी...गर्म-मिजाजी...सब दिखावा है ...
मोहब्बत छिपाने का...माशूक को... अंदाज़  दिखाने का...
आंसू...आशाएं...अरमान...निकलने नहीं देता दिल से...
किसी से  किया है...वादा मैंने...खुद  से 'निभाने' का...

Friday, 16 September 2011

'मलाल' न रक्खा....



बरसों के  हिसाब ओ ख़याल छूट गए...तेरी सोहबत में साकी...
तूने हिजाब का ख़याल न रक्खा...मैंने शराब का हिसाब न रक्खा...
हम पीते हैं के..झेल सकें ज़िन्दगी के सवालों को..
अहसान तेरा ... तूने कोई सवाल न रक्खा...
थक गए हयात में...खाबों के जुगनू पकड़ के अब...
जो रहा वो रहा ...किसी उडनेवाले का 'मलाल' न रक्खा..
'नशे' की नींद में भी...आँखों में चुभता था हरदम ...
वापस कर दिए सब ...'होशवालों' का कोई ख्वाब न रक्खा.. 
वो हम नहीं  कमदिल...जो कम-कम,बचा-बचा के पीते हैं...
पी चुके अपने हिस्से की...एक क़तरा भी 'ज़नाब' न रक्खा...
बिना पिए भी...नशा 'खुद्दारी'का तारी  रहता है 'संतोष'.....
दोस्त हैं तो गुलाम...वरना किसी 'रुतबे' का 'रुवाब'न रक्खा..

Thursday, 8 September 2011

सोच लेना पहले

सोच लेना पहले....
हर फैसले के.....
मंजिल नहीं होती...
आखिर में हर रास्ते के..
मगर...कई बार ...
रास्ते ,मंजिलों के लिए नहीं
सिर्फ साथ के लिए चुने जाते हैं...!
सोच लेना पहले....
हर सपने के....
आसां नहीं  होता.. सपनों को...
याद रख पाना ..नींद खुलने पर 
मगर..कई बार..
सपने पूरे  करने के लिए नहीं....
सिर्फ खुश रहने के लए देखे जाते हैं...!
सोच लेना पहले 
घर  बनाने के.....
बहोत  मुश्किल होता है...
मकान को घर.....बनाये रखना...
और  ...कई बार...
खुद 'टूट' के भी घर बचाना होता है...
नहीं तो....बच्चे 'भींग' जाते हैं......!


Saturday, 3 September 2011

एक ख्वाब में जी रहा है ....!



बस गया है 'कुछ' आँखों में

'वो' पलकों को सी रहा है ....

एक ख्वाब में जी रहा है ....!

'प्रिये' जो भी कहो ला दूंगा...

ज्यों पानी..रूपया उसी तरा है...

एक ख्वाब में जी रहा है ....!

घिरा जोमुश्किलों में..दादा कहेंगे...

रो मत ..भाई नहीं मरा है..

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

बिटिया हुयी बड़ी अब...

'वो' अब भी उसी तरा है..

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

'नहीं पीता' के माँ कहेगी...

'बेटा'फिर से 'पी' रहा है...

एक ख्वाब में जी रहा है ...!

संसद में बैठा 'अन्ना'..

'उसका'चेहरा खुशी भरा है....

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

'जोड़ा' कुछ भी नहीं तो क्या..

'वो' सबकी ख़ुशी रहा है...

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

रिश्वत पे बिगड़ा नेता...

'बे'.. ईमान नहीं मरा है...

एक ख्वाब में जी रहा है ... !

और

कह के 'किरण' की तरा सच एक दिन

वो भी कहेगा ...हाँ जी कहा है...

एक ख्वाब में जी रहा है... !

Friday, 2 September 2011

घबराता है.

आँखों को हर पल उसी दिलरूबा की तलाश
दिल है के हर सूरत ऐ नाज़ से घबराता है
वो 'छन्न' से हुयी थी सपने  टूटने की आवाज़ ...
के दिल आज तलक हर साज से घबराता है..
सुने हैं इतने किस्से ....रांझों और मजनुओं के..
अंजाम खुद अपने ही...आगाज़ से घबराता है..
छीन लाएगा अपने बच्चों का निवाला...
ये वो परिंदा नहीं जो बाज से घबराता है ...
ढूंढते है पनाह लोग...ख्वाबों की उड़ान में...
संतोष ...खुद अपनी परवाज़ से घबराता है..
                         'और '
चूका देता..झूठा टैक्स भी 'अरविन्द' 
मगर असल  से नहीं ब्याज से घबराता है. 

Thursday, 1 September 2011

नहीं आता ..


इबादत करता हूँ ,मंदिर मस्जिद नहीं जाता...
दोस्ती में हाथ ,पहले बढ़ाने से गिर नहीं जाता...
हर आम ओ ख़ास शहर में, चाहनेवाला है उसका ...
सिर्फ इसलिए...कोई शख्स... मुझे नहीं भाता...!
मुहब्बत करता हूँ, मगर 'क़ुबूल' नहीं पाता...
झुकने से तेरे आगे ,मेरा गुरूर नहीं जाता...
अच्छा लगे तुमको.... मुरीद हो जाओ मेरे...
सिर्फ इसलिए...कहूँ 'नज़्म'... मुझे नहीं आता...!
शिकायत करता हूँ,जवाब ऐ तहरीर नहीं पाता...
कहने से किसी को 'ज़नाब' मेरा ज़मीर नहीं जाता...
मैं अदना 'कारिन्दा'ओर वो बड़े 'साहिबान' लगें...
सिर्फ इसलिए...कोई 'हुक्म'... मुझे नहीं भाता...!
अदावत करता हूँ,हुनर ऐ 'क़त्ताल' नहीं आता ..
जंग में प्यादे से खाऊं मात ....मलाल नहीं आता
डसा है जिसने ....वो कभी आस्तीन में पला था...
सिर्फ इसलिए....'बख्श दूं'...ख़याल नहीं आता...!
बग़ावत करता हूँ, मुकाबिल तलवार नहीं लाता...
दब जाऊं बुजुर्गों से, ..मेरा ज़लाल नहीं जाता...
जो बचाई खुद्दारी तो...गँवा सकता हूँ सबकुछ...
सिर्फ इसलिए..डर जाऊं ... 'मेरे यार'...नहीं आता...!

क़त्ताल=जो असहमत लोगों को मारने के लिए तैयार हो
क़ुबूल =इकरार
कारिन्दा=स्टाफ,मुंशी
मलाल =अफ़सोस 

Wednesday, 31 August 2011

...समंदर


बचपन से नहीं जानता उसको..
पर बचपना जानता हूँ उसका...
मिली तब भी छोटी नहीं थी..
हाँ मासूमियत बच्चों जैसी ही थी ..
हर बात पे साबित करना चाहती थी..
के,अब बच्ची नहीं है वो..
पर कहाँ समझ पाती थी..
के,मैं उसकी बातें नहीं आवाज़ सुनता हूँ..
के,मैं ग्रुप फोटो में भी सिर्फ उसको ही देख पाता हूँ..
के, मैं अचानक चुप हो जाता हूँ,उसके दोस्तों  के  किस्से सुनके...
जब तक वो समझ पाई ...
मैं भी बच्चा बन गया था उसके साथ..
अपनी समझदारी के लबादे उतार ...
एक अलिखित समझौता हो गया..
जब वो बच्चों की तरह..
लडती,चीखती,भटकती,
मैं बड़ा बन जाता..मना लेता 
जब मैं बहकता,मचलता,बहलाता..
वो बहोत बड़ी बन जाती..रोक लेती 
ज़िन्दगी झरने सी लगती थी..
फिर एक दिन !
दोनों बड़े हो गए..
उसने रोका...
और मैं ही मना पाया..
बचपना भूल गए हम...!
ज़िन्दगी ठहर गयी समंदर की तरह 

Sunday, 21 August 2011

कृष्ण!!!

कृष्ण!!! एक कला है..!

एक मीरा से,  आत्मिक प्यार की........!

सोलह हज़ार रानियों से, व्यवहार  की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

सुदामा से, मित्र  के उद्धार की...!

जरासंध से, दुष्ट के संहार की...!

कृष्ण!!! एक कला है..!

द्रौपदी को, चीर के सहार की.....!

सखियन से ,वस्त्रों के खिलवाड़ की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

गोपियों पर रास के  फुहार की...!

पूतना पर बालक के प्रहार की...!

कृष्ण!!! एक कला है..!

मित्र मनसुखा से,मान और मनुहार  की..!

कालिया से,विषधर नाग के  नथार की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

दाऊ से अग्रज को, नमस्कार की..!

कंस से मामा के,स्वर्ग-सिधार की...!

कृष्ण!!! एक कला है..!

महाभारत में अर्जुन को ललकार की..!

मरना हो निश्चित तो,युद्ध से भगजान  की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

गोवर्धन से पर्वत को,कनिका पै धार की..!

माखन की चोरी  पे,मैया से गुहार की....!

कृष्ण!!! एक कला है..!

जननी देवकी से , विछोह संभार की..!

माता  यशोदा के,चरण पखार की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

बांसुरी की तान पे,सुध बिसरान की..!

पाञ्चजन्य के नाद पे,अस्त्र  उठान की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

राजनिती में ,उच्चतम विचार की..!

युद्ध के मैदान में,घातक दुष्प्रचार की..!

कृष्ण!!! एक कला है..!

जीवन में,मर के भी मार की..!

प्यार में,जीत कर भी हार की...!

            और 

कृष्ण करे सो होय...!

फिर  दोष काहे को  मोय......!