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Friday, 2 September 2011

घबराता है.

आँखों को हर पल उसी दिलरूबा की तलाश
दिल है के हर सूरत ऐ नाज़ से घबराता है
वो 'छन्न' से हुयी थी सपने  टूटने की आवाज़ ...
के दिल आज तलक हर साज से घबराता है..
सुने हैं इतने किस्से ....रांझों और मजनुओं के..
अंजाम खुद अपने ही...आगाज़ से घबराता है..
छीन लाएगा अपने बच्चों का निवाला...
ये वो परिंदा नहीं जो बाज से घबराता है ...
ढूंढते है पनाह लोग...ख्वाबों की उड़ान में...
संतोष ...खुद अपनी परवाज़ से घबराता है..
                         'और '
चूका देता..झूठा टैक्स भी 'अरविन्द' 
मगर असल  से नहीं ब्याज से घबराता है. 

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